बुधवार, 18 जुलाई 2012


फिर तुम्हे लिख दूं धरा के ताल पर,
फिर तुम्हे रच दूं गगन के भाल पर,
हो गए मुझको बहुत से दिन तुम्हारी छवि संवारे,
जहर गए कितने धरा के फूल नभ के नील आरे।....

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