बुधवार, 18 जुलाई 2012

कैफ़ी आज़मी



जिन्दगी नाम है खुशलम्हो का,
और उनमें  भी वो ही एक लम्हा,
जिसमें दो बोलती आँखे,
चाय की प्याली से जब उठें तो ,
दिल में डूबें ,
डूब के दिल में कहें,
आज तुम कुछ न कहो,
आज मैं कुछ न कहूं 
 बस यूँ ही बैठे रहें ,
हाथ में हाथ लिए,
गम की सौगात लिए,
ग़रमि-ए-जज़्बात  लिए,
कौन जाने इसी लम्हे में ,
दूर परबत  पे कहीं,
बर्फ़  पिघलने ही लगे।


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